अर्जुन उवाच ।
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ ३-१॥
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ ३-२॥
सन्धिः
अर्जुन उवाच = अर्जुनः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य) + उवाच
चेत्कर्मणस्ते = चेत् + कर्मणः (विसर्जनीयस्य सः) + ते
बुद्धिर्जनार्दन = बुद्धिः (ससजुषो रुः) + जनार्दन
व्यामिश्रेणेव = व्यामिश्रेण (एचोऽयवायावः) + इव
मोहयसीव = मोहयसि (अकः सवर्णे दीर्घः) + इव
तदेकं वद = तत् (झलां जशोऽन्ते) + एकम् (मोऽनुस्वारः) + वद
श्रेयोऽहमाप्नुयाम् = श्रेयः (अतो रोरप्लुतादप्लुते) + अहम् + आप्नुयाम्
पदच्छेद
अर्जुनः , उवाच , ज्यायसी , चेत् , कर्मणः , ते , मता , बुद्धिः , जनार्दन , तत् , किम् , कर्मणि , घोरे , माम् , नियोजयसि , केशव ,
व्यामिश्रेण , इव , वाक्येन , बुद्धिम् , मोहयसि , इव , मे , तत् , एकम् , वद , निश्चित्य , येन , श्रेयः , अहम् , आप्नुयाम्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| अर्जुनः | अर्जुन | अ , पु , १ , एक | Arjun |
| कर्मणः | कर्मन् | न् , नपु , ५, एक | Than action |
| ते | युष्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , एक | Of you |
| मता | मता | आ , स्त्री , १ , एक | Opinion |
| बुद्धिः | बुद्धि | इ , स्त्री , १ , एक | Knowledge / Wisdom |
| जनार्दन | जनार्दन | अ , पु , सं , एक | Janardana (Shri Krishna) |
| तत् | तत् | त् – सर्व , नपु , १ , एक | That |
| किम् | किम् | म् – सर्व , नपु , १ , एक | Why |
| कर्मणि | कर्मन् | न् , नपु , ७, एक | In action |
| माम् | अस्मद् | द् – सर्व , NA , २ , एक | To me |
| केशव | केशव | अ , पु , सं , एक | Keshava (Shri Krishna) |
| व्यामिश्रेण | व्यामिश्रम् | अ , नपु , ३ , एक | With Perplexed |
| वाक्येन | वाक्यम् | अ , नपु , ३ , एक | With speech |
| बुद्धिम् | बुद्धि | इ , स्त्री , २ , एक | Intellect |
| मे | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , एक | My |
| एकम् | एकम् | अ , नपु , १ , एक | One |
| येन | यद् | द् – सर्व , पु , ३ , एक | By which |
| श्रेयः | श्रेयस् | स् , नपु , १ , एक | Highest |
| अहम् | अस्मद् | द् – सर्व , NA , १ , एक | I |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| चेत् | If |
| घोरे | terrible |
| ज्यायसी | Better |
| इव | Like |
| निश्चित्य = निस् + चित् + य (कृदन्त – ईक्ष् + ल्यबन्त) | Decisive |
अन्वयः
अर्जुनः उवाच । (हे) जनार्दन ! कर्मणः बुद्धिः ज्यायसी (इति) ते मता चेत् , (हे) केशव ! माम् घोरे तत् कर्मणि किम् नियोजयसि ।
व्यामिश्रेण इव वाक्येन (त्वम्) मे बुद्धिम् मोहयसि इव , येन अहम् श्रेयः आप्नुयाम् तत् एकम् निश्चित्य वद ।
Arjun Said: Hey Janardana, if you think Knowledge is better than action, hey Keshava, why engage me in that terrible action? With your seemingly perplexing speech, (you) confuse my intellect, tell me decisively that one path by which I attain the highest.
श्रीभगवानुवाच ।
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३-३॥
सन्धिः
लोकेऽस्मिन् = लोके (एङः पदान्तादति) + अस्मिन्
मयानघ = मया (अकः सवर्णे दीर्घः) + अनघ
पदच्छेद
श्रीभगवान् , उवाच , लोके , अस्मिन् , द्विविधा , निष्ठा , पुरा , प्रोक्ता , मया , अनघ , ज्ञानयोगेन , साङ्ख्यानां , कर्मयोगेन , योगिनाम्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| श्रीभगवान् | श्रीभगवत् | त् , पु , १ , एक | Shri Bhagavaan (Lord Krishna) |
| लोके | लोक | अ , पु , ७ , एक | World |
| अस्मिन् | इदम् | म् – सर्व , पु , ७ , एक | In this |
| द्विविधा | द्विविधा | आ , स्त्री , १ , एक | Two |
| निष्ठा | निष्ठा | आ , स्त्री , १ , एक | Path |
| प्रोक्ता | प्रोक्ता | आ , स्त्री , १ , एक | said |
| मया | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ३ , एक | By me |
| अनघ | अनघ | अ , पु , सं , एक | Sinless (Arjun) |
| ज्ञानयोगेन | ज्ञानयोग | अ , पु , ३ , एक | By the path of knowledge |
| साङ्ख्यानां | साङ्ख्य | अ , पु , ६ , ब | Of Sankhyans |
| कर्मयोगेन | कर्मयोग | अ , पु , ३ , एक | By the path of action |
| योगिनाम् | योगी | ई , स्त्री , ६ , ब | Of Yogins |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| उवाच | ब्रू , २ , प , लिट् , प्र , एक | (He) Spoke |
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| .पुरा | Prior / Ancient |
अन्वयः
श्रीभगवान् उवाच । (हे) अनघ । अस्मिन् लोके साङ्ख्यानां ज्ञानयोगेन योगिनाम् कर्मयोगेन द्विविधा निष्ठा (इति) पुरा मया प्रोक्ता ।
Shri Bhagwan said – Oh sinless one, there are two paths in this world, (as) I said in the beginning of the time.
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ३-४॥
सन्धिः
कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं = कर्मणाम् + अनारम्भात् (यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा) +नैष्कर्म्यमं
पुरुषोऽश्नुते = पुरुषः (अतो रोरप्लुतादप्लुते) + अश्नुते
संन्यसनादेव = संन्यसनात् (झलां जशोऽन्ते) + एव
पदच्छेद
न , कर्मणाम् , अनारम्भात् , नैष्कर्म्यम् , पुरुषः , अश्नुते , न , च , संन्यसनात् , एव , सिद्धिम् , समधिगच्छति
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| कर्मणाम् | कर्मन् | न् , नपु , ६ , ब | Of actions |
| अनारम्भात् | अनारम्भ | अ , पु , ५ , एक | From non-performance |
| नैष्कर्म्यम् | नैष्कर्म्य | अ , नपु , | Action-less-ness |
| पुरुषः | पुरुष | अ , पु , १ , एक | Man |
| संन्यसनात् | संन्यसन | अ , पु , ५ , एक | From renunciation |
| सिद्धिम् | सिद्धि | इ , पु , २ , एक | perfection |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| न | No |
| च | And |
| एव | mere |
अन्वयः
पुरुषः कर्मणाम् अनारम्भात् नैष्कर्म्यम् न अश्नुते । संन्यसनात् एव च सिद्धिम् न समधिगच्छति ।
Man does not reach action-less-ness from non-performance of actions. From mere renunciation also perfection is not attained.
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ३-५॥
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ३-६॥
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ३-७॥
सन्धिः
तिष्ठत्यकर्मकृत् = तिष्ठति (इको यणचि) +अकर्मकृत्
ह्यवशः = हि (इको यणचि) + अवशः
प्रकृतिजैर्गुणैः = प्रकृतिजैः (ससजुषो रुः) + गुणैः
य आस्ते = यः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि , लोपः शाकल्यस्य) + आस्ते
स उच्यते = सः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि , लोपः शाकल्यस्य) + उच्यते
यस्त्विन्द्रियाणि = यः (विसर्जनीयस्य सः) + तु (इको यणचि) + इन्द्रियाणि
नियम्यारभतेऽर्जुन = नियम्य (अकः सवर्णे दीर्घः) + आरभते (एङः पदान्तादति) + अर्जुन
स विशिष्यते = सः (हलि सर्वेषाम्) + विशिष्यते
पदच्छेद
न , हि , कश्चित् , क्षणम् , अपि , जातु , तिष्ठति , अकर्मकृत् , कार्यते , हि , अवशः , कर्म , सर्वः , प्रकृतिजैः , गुणैः , कर्मेन्द्रियाणि , संयम्य , यः , आस्ते , मनसा , स्मरन् , इन्द्रियार्थान् , विमूढात्मा , मिथ्याचारः , सः , उच्यते , यः , तु , इन्द्रियाणि , मनसा , नियम्य , आरभते , अर्जुन , कर्मेन्द्रियैः , कर्मयोगम् , असक्तः , सः , विशिष्यते
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| क्षणम् | क्षण | अ , नपु , २ , एक | A moment |
| अकर्मकृत् | अकर्मकृत् | त् , पु , १ , एक | Without performing action |
| सर्वः | सर्व | अ – सर्व , पु , १ , एक | All |
| प्रकृतिजैः | प्रकृतिज | अ , पु , ३ , ब | Born out of Prakriti (Nature) |
| गुणैः | गुण | अ , पु , ३ , ब | By qualities |
| अवशः | अवश | अ , पु , १ , एक | Helplessly |
| कर्म | कर्मन् | न् , नपु , २ , एक | Action |
| कर्मेन्द्रियाणि | कर्मेन्द्रिय | अ , नपु , २ , ब | Sense organs |
| यः | यद् | द् – सर्व , पु , १ , एक | One who |
| मनसा | मनस् | स् , नपु , ३ , एक | With the mind |
| स्मरन् | स्मरन् | त् , पु , १ , एक | Remembering |
| इन्द्रियार्थान् | इन्द्रियार्थ | अ , पु , २ , ब | Sense objects |
| विमूढात्मा | विमूढात्मन् | न् , पु , १ , एक | deluded |
| मिथ्याचारः | मिथ्याचार | अ , पु , १ , एक | hypocrite |
| सः | तत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | He |
| इन्द्रियाणि | इन्द्रिय | अ , नपु , २ , ब | Sense organs |
| अर्जुन | अर्जुन | अ , पु , सं , एक | Arjun |
| कर्मेन्द्रियैः | कर्मेन्द्रिय | अ , नपु , ३ , ब | By organs of action |
| कर्मयोगम् | कर्मयोग | अ , पु , २ , एक | Karmayoga |
| असक्तः | असक्त | अ , पु , १ , एक | Unattached |
| सः | तत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | He |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| तिष्ठति | स्था , १ , प , लट् , प्र , एक | (He) remains / establishes |
| कार्यते | कृ , ८ , आ , लट् , प्र , एक | Is done |
| आस्ते | आस् , २ , आ , लट् , प्र , एक | (He) sits |
| उच्यते | ब्रू , २ , आ , लट् , प्र , एक | (He) is called |
| आ-रभते | रभ् , १ , आ , लट् , प्र, एक | (He) begins / commences |
| विशिष्यते | शास् , २ , आ , ल्रुट् , प्र , एक | (He) excels |
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| न | No |
| हि | indeed |
| कश्चित् | No one |
| अपि | Even |
| जातु | Ever |
| संयम्य = सम् + यम् + य / त्य कृदन्त – सम् + यम् + ल्यबन्त | Restraining |
| तु | But |
| नियम्य = नि + यम् + य / त्य कृदन्त – नि + यम् + ल्यबन्त | Controlling |
अन्वयः
हि कश्चित् अपि जातु क्षणम् (अपि ) अकर्मकृत् न तिष्ठति । हि सर्वः प्रकृतिजैः गुणैः अवशः कर्म कार्यते ।
यः कर्मेन्द्रियाणि संयम्य , मनसा इन्द्रियार्थान् स्मरन् आस्ते , सः विमूढात्मा मिथ्याचारः उच्यते ।
(हे) अर्जुन ! यः तु इन्द्रियाणि मनसा नियम्य असक्तः (सन्) कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् आरभते , सः विशिष्यते ।
No one can ever remain without performing any action, even for a moment. Everyone helplessly performs action by the qualities born out of prakriti.
One who restraining sense organs, sits thinking of the sense objects with mind, he is deluded and is called hypocrite.
Hey Arjun, but one who controls senses with mind, engages his senses in karma yoga unattached, such a person excels.
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥ ३-८॥
सन्धिः
ज्यायो ह्यकर्मणः = ज्यायः (हशि च, आद्गुणः) + हि (इको यणचि) + अकर्मणः
शरीरयात्रापि = शरीरयात्रा (अकः सवर्णे दीर्घः) + अपि
प्रसिद्ध्येदकर्मणः = प्रसिद्ध्येत् (झलां जशोऽन्ते) + अकर्मणः
पदच्छेद
नियतम् , कुरु , कर्म , त्वम् , कर्म , ज्यायः , हि , अकर्मणः , शरीरयात्रा , अपि , च , ते , न , प्रसिद्ध्येत् , अकर्मणः
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| नियतम् | नियत | अ , नपु , २ , एक | Obligatory |
| कर्म | कर्मन् | न् , नपु , २ , एक | Action |
| त्वम् | युष्मद् | द् – सर्व , NA , १ , एक | You |
| ज्यायः | ज्याय | अ , पु , १ , एक | Superior / Better |
| अकर्मणः | अकर्मन् | न् , नपु , ५ , एक | Than Inaction |
| शरीरयात्रा | शरीरयात्रा | आ , स्त्री , १ , एक | Maintenance of body |
| ते | युष्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , एक | Your |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| कुरु | कृ , ८ , प , लोट् , म , एक | (You) do |
| प्र-सिद्ध्येत् | सिध् , ४ , प , लिङ् , प्र , एक | Would be possible |
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| हि | Indeed |
| अपि | Even |
| च | And |
| न | Not |
अन्वयः
त्वम् नियतम् कर्म कुरु । हि कर्म अकर्मणः ज्यायः (भवति) । अपि च अकर्मणः ते शरीरयात्रा (अपि) न प्रसिद्ध्येत् ।
You perform prescribed actions. Action is indeed superior than inaction. Even maintenance of your body would not be possible with inaction.
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ३-९॥
सन्धिः
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र = यज्ञार्थात् + कर्मणः (अतो रोरप्लुतादप्लुते) + अन्यत्र
लोकोऽयं कर्मबन्धनः = लोकः (अतो रोरप्लुतादप्लुते) + अयं
पदच्छेद
यज्ञार्थात् , कर्मणः , अन्यत्र , लोकः , अयम् , कर्मबन्धनः , तदर्थम् , कर्म , कौन्तेय , मुक्तसङ्गः , समाचर
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| यज्ञार्थात् | यज्ञार्थ | अ , पु , ५ , एक | Than for the sake of sacrifice |
| कर्मणः | कर्मन् | न् , नपु , ५ , एक | Than Karma |
| लोकः | लोक | अ , पु , १ , एक | World |
| अयम् | इदम् | म् – सर्व , पु , १ , एक | This |
| कर्मबन्धनः | कर्मबन्धन | अ , पु , १ , एक | Bound by action |
| तदर्थम् | तदर्थ | अ , नपु , २ , एक | For that sake |
| कर्म | कर्मन् | न् , नपु , १ , एक | action |
| कौन्तेय | कौन्तेय | अ , पु , सं , एक | Kounteya (Arjun) |
| मुक्तसङ्गः | मुक्तसङ्ग | अ , पु , १ , एक | Free from all attachments |
| समाचर | समाचरन् | न् , नपु , १ , एक | perform |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु, गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| अन्यत्र | Any other |
अन्वयः
(हे) कौन्तेय ! यज्ञार्थात् अन्यत्र कर्मणः अयम् लोकः कर्मबन्धनः , तदर्थं मुक्तसङ्गः कर्म समाचर ।
Hey Kounteya, any action other than with the attitude of Yajnya, that binds us. For that, perform action with best of ability free of any attachment.
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ ३-१०॥
सन्धिः
पुरोवाच = पुरा (आद्गुणः) + उवाच
वोऽस्त्विष्टकामधुक् = वः (अतो रोरप्लुतादप्लुते) + अस्तु (इको यणचि) + इष्टकामधुक्
पदच्छेद
सहयज्ञाः , प्रजाः , सृष्ट्वा , पुरा , उवाच , प्रजापतिः , अनेन , प्रसविष्यध्वम् , एषः , वः , अस्तु , इष्टकामधुक्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| सहयज्ञाः | सहयज्ञा | आ , स्त्री , २ , ब | With sacrifice |
| प्रजाः | प्रजा | आ , स्त्री , २ , ब | All beings |
| प्रजापतिः | प्रजापति | इ , पु , १ , एक | Prajapati (Brahmaji) |
| अनेन | इदम् | म् – सर्व , पु , ३ , एक | Through this |
| एषः | एतत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | This |
| वः | युष्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , ब | Your |
| इष्टकामधुक् | Wish fulfilling cow |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| सृष्ट्वा = सृष् + त्वा कृदन्त – सृष् + क्त्वान्त | Having created |
| पुरा | Ancient |
अन्वयः
प्रजापतिः पुरा प्रजाः सहयज्ञाः सृष्ट्वा उवाच । अनेन प्रसविष्यध्वम् एषः वः इष्टकामधुक् अस्तु (भवतु) ।
In the beginning of the creation, Prajapati (Father of all beings – Brahmaji) having created all beings with sacrifices, ordered, “Through this you shall become prosperous, let this be your wish fulfilling cow”.
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ३-११॥
सन्धिः
देवा भावयन्तु = देवाः (हलि सर्वेषाम्) + भावयन्तु
पदच्छेद
देवान् , भावयत , अनेन , ते , देवाः , भावयन्तु , वः , परस्परम् , भावयन्तः , श्रेयः , परम् , अवाप्स्यथ
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| देवान् | देव | अ , पु , २ , ब | gods |
| अनेन | इदम् | म् – सर्व , पु , ३ , एक | Through this |
| ते | तत् | त् – सर्व , पु , १ , ब | Those |
| देवाः | देव | अ , पु , १ , ब | gods |
| वः | युष्मद् | द् – सर्व , NA , २ , ब | You |
| भावयन्तः | भावयत् | त् , पु , १ , एक | Worship |
| श्रेयः | श्रेय | अ , पु , १ , एक | good |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| अनेन | Through this |
| परम् | Highest |
| परस्परम् | Each other |
अन्वयः
अनेन देवान् भावयत् ते देवाः वः भावयन्तु । परस्परम् भावयन्तः परम् श्रेयः अवाप्स्यथ ।
Worship devata with this, those devata will worship you. Such mutual worship brings great goodness.
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥ ३-१२॥
सन्धिः
वो देवा = वः (हशि च, आद्गुणः) + देवा
देवा दास्यन्ते = देवाः (हलि सर्वेषाम्) + दास्यन्ते
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो = तैः () + दत्तान् +अप्रदाय () + एभ्यः () + यो
यो भुङ्क्ते = यः (हशि च, आद्गुणः) + भुङ्क्ते
स्तेन एव = स्तेनः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य) + एव
पदच्छेद
इष्टान् , भोगान् , हि , वः , देवाः , दास्यन्ते , यज्ञभाविताः , तैः , दत्तान् , अप्रदाय , एभ्यः , यः , भुङ्क्ते , स्तेनः , एव , सः
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| इष्टान् | इष्ट | अ , पु , २ , ब | Desired |
| भोगान् | भोग | अ , पु , २ , ब | enjoyments |
| वः | युष्मद् | द् – सर्व , NA , २ , ब | You |
| देवाः | देव | अ , पु , १ , ब | gods |
| यज्ञभाविताः | यज्ञभावित | अ , पु , १ , ब | Nourished by sacrifice |
| तैः | तत् | त् – सर्व , पु , ३ , ब | By them |
| दत्तान् | दत्त | अ , पु , २ , ब | given |
| एभ्यः | इदम् | म् – सर्व , पु , ४ , ब | for them |
| यः | यद् | द् – सर्व , पु , १ , एक | One who |
| स्तेनः | स्तेन | अ , पु , १ , एक | thief |
| सः | तत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | He |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| हि | indeed |
| एव | Only |
| अप्रदाय = अ + प्र + दा + य कृदन्त – उपसर्ग + दा + ल्यबन्त | Without offering |
अन्वयः
यज्ञभाविताः देवाः वः इष्टान् भोगान् दास्यन्ते हि । यः तैः दत्तान् एभ्यः अप्रदाय भुङ्क्ते सः स्तेन एव ।
Devatas nourished by sacrifice with indeed give desired objects. One who enjoys objects given by devatas without offering in return, is indeed a thief.
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ ३-१३॥
सन्धिः
सन्तो मुच्यन्ते = सन्तः (हशि च, आद्गुणः) + मुच्यन्ते
त्वघं = तु (इको यणचि) + अघं
पापा ये = पापाः (हलि सर्वेषाम्) + ये
पचन्त्यात्मकारणात् = पचन्ति (इको यणचि) + आत्मकारणात्
पदच्छेद
यज्ञशिष्टाशिनः , सन्तः , मुच्यन्ते , सर्वकिल्बिषैः , भुञ्जते , ते , तु , अघम् , पापाः , ये , पचन्ति , आत्मकारणात्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| यज्ञशिष्टाशिनः | यज्ञशिष्टाशिन | अ , पु , १ , एक | Consumers of leftovers of sacrifice |
| सन्तः | सन्त | अ , पु , १ , एक | Righteous |
| सर्वकिल्बिषैः | सर्वकिल्बिष | अ , पु , ३ , ब | From all impurities |
| ते | तत् | त् – सर्व , पु , १ , ब | They |
| अघम् | अघ | अ , नपु , १ , एक | sin |
| पापाः | पाप | अ , पु , १ , ब | Sins |
| ये | यद् | द् – सर्व , पु , १ , ब | Those who |
| आत्मकारणात् | आत्मकारण | अ , पु , ५ , एक | For their own sake |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| मुच्यन्ते | मुच् , ६ , आ , लट् , प्र , ब | (They) are freed |
| भुङ्क्ते | भुज् , ७ , आ , लट् , प्र , एक | (He) enjoys |
| पचन्ति | पच् , १ , प , लट् , प्र , ब | (They) cook |
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| तु | but |
अन्वयः
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तः सर्वकिल्बिषैः मुच्यन्ते । ये आत्मकारणात् पचन्ति ते पापाः तु अघम् भुञ्जते ।
The righteous who consumes leftovers of sacrifice, are freed from all purities. One sinful ones who cooks only for their own sake, only consumes sin.
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ ३-१४॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ ३-१५॥
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ ३-१६॥
सन्धिः
अन्नाद्भवन्ति = अन्नात् (झलां जशोऽन्ते) + भवन्ति
पर्जन्यादन्नसम्भवः = पर्जन्यात् (झलां जशोऽन्ते) + अन्नसम्भवः
यज्ञाद्भवति = यज्ञात् (झलां जशोऽन्ते) + भवति
पर्जन्यो यज्ञः = पर्जन्यः (हशि च , आद्गुणः) + यज्ञः
ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् = ब्रह्म (अकः सवर्णे दीर्घः) + अक्षरसमुद्भवम्
नानुवर्तयतीह = न (अकः सवर्णे दीर्घः) + अनुवर्तयति (अकः सवर्णे दीर्घः) + इह
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं = अघायुः (ससजुषो रुः) + इन्द्रियारामः (हशि च , आद्गुणः) + मोघं
स जीवति = सः (एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि) + जीवति
पदच्छेद
अन्नात् , भवन्ति , भूतानि , पर्जन्यात् , अन्नसम्भवः , यज्ञात् , भवति , पर्जन्यः , यज्ञः , कर्मसमुद्भवः
कर्म , ब्रह्मोद्भवम् , विद्धि , ब्रह्म , अक्षरसमुद्भवम् , तस्मात् , सर्वगतम् , ब्रह्म , नित्यम् , यज्ञे , प्रतिष्ठितम्
एवम् , प्रवर्तितम् , चक्रम् , न , अनुवर्तयति , इह , यः , अघायुः , इन्द्रियारामः , मोघम् , पार्थ , सः , जीवति
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| अन्नात् | अन्न | अ , नपु , ५ , एक | From food |
| भूतानि | भूत | अ , नपु , १ , ब | Beings |
| पर्जन्यात् | पर्जन्य | अ , पु , ५ , एक | From rain |
| अन्नसम्भवः | अन्नसम्भव | अ , पु , १ , एक | Food production |
| यज्ञात् | यज्ञ | अ , पु , ५ , एक | From sacrifice |
| पर्जन्यः | पर्जन्य | अ , पु , १ , एक | Rain |
| यज्ञः | यज्ञ | अ , पु , १ , एक | Sacrifice |
| कर्मसमुद्भवः | कर्मसमुद्भव | अ , पु , १ , एक | Born of Action |
| कर्म | कर्मन् | न् , नपु , १ , एक | Action |
| ब्रह्मोद्भवम् | ब्रह्मोद्भव | अ , नपु , २ , एक | Born of Brahman |
| ब्रह्म | ब्रह्मन् | न् , नपु , १ , एक | Brahman |
| अक्षरसमुद्भवम् | अक्षरसमुद्भव | अ , नपु , २ , एक | Born of imperishable |
| तस्मात् | तत् | त् – सर्व , पु , ५ , एक | Therefore |
| सर्वगतम् | सर्वगत | अ , नपु , १ , एक | All pervading |
| नित्यम् | नित्य | अ , पु , २ , एक‘ | Always |
| यज्ञे | यज्ञ | अ , पु , ७ , एक | In the sacrifice |
| प्रतिष्ठितम् | प्रतिष्ठित | अ , पु , २ , एक | Establishes |
| प्रवर्तितम् | प्रवर्तित | अ , पु , २ , एक | Revolving |
| चक्रम् | चक्र | अ , पु , २ , एक | Cycle |
| यः | यद् | द् – सर्व , पु , १ , एक | The one who |
| अघायुः | अघायु | उ , पु , १ , एक | Living in sin |
| इन्द्रियारामः | इन्द्रियाराम | अ , पु , १ , एक | Living in sense pleasures |
| मोघम् | मोघ | अ , पु , २ , एक | In vain |
| पार्थ | पार्थ | अ , पु , सं , एक | Paartha (Arjun) |
| सः | तत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | He |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| एवम् | Thus |
| न | Not |
| इह | Here |
अन्वयः
भूतानि अन्नात् भवन्ति । अन्नसम्भवः पर्जन्यात् भवति । पर्जन्यः यज्ञात् भवति । यज्ञः कर्मसमुद्भवः (भवति) ।
कर्म ब्रह्मोद्भवम् (इति) विद्धि । ब्रह्म अक्षरसमुद्भवम् भवति । तस्मात् सर्वगतम् ब्रह्म नित्यम् यज्ञे प्रतिष्ठितम् (विद्धि) ।
(हे) पार्थ ! यः एवम् प्रवर्तितम् चक्रम् इह न अनुवर्तयति अघायुः इन्द्रियारामः , सः मोघम् जीवति ।
All beings come from food. Food is created from rain. Rain comes from sacrifice. Sacrifice comes out of action. Know that karma comes from Brahman. Brahman comes out of imperishable. Thus, all-pervading brahman is ever present in sacrifice. Hey Paartha, one who does not follow this cycle of creation, living in sin, rejoicing in sense pleasures, he lives in vain.
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ ३-१७॥
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ ३-१८॥
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ ३-१९॥
सन्धिः
यस्त्वात्मरतिरेव = यः (विसर्जनीयस्य सः) + तु (इको यणचि) + आत्मरतिः (ससजुषो रुः) + एव
स्यादात्मतृप्तश्च = स्यात् (झलां जशोऽन्ते) + आत्मतृप्तः (विसर्जनीयस्य सः , स्तोः श्चुना श्चुः) + च
आत्मन्येव = आत्मनि (इको यणचि) + एव
सन्तुष्टस्तस्य = सन्तुष्टः (विसर्जनीयस्य सः) + तस्य
नैव = न (वृद्धिरेचि) + एव
कृतेनार्थो नाकृतेनेह = कृतेन (अकः सवर्णे दीर्घः) + अर्थः (हशि च , आद्गुणः) + न (अकः सवर्णे दीर्घः) + अकृतेन (आद्गुणः) + इह
चास्य = च (अकः सवर्णे दीर्घः) + अस्य
कश्चिदर्थव्यपाश्रयः = कश्चित् (झलां जशोऽन्ते) + अर्थव्यपाश्रयः
तस्मादसक्तः = तस्मात् (झलां जशोऽन्ते) + असक्तः
असक्तो ह्याचरन्कर्म = असक्तः (हशि च , आद्गुणः) + हि (इको यणचि) + आचरन् + कर्म
परमाप्नोति = परम (अकः सवर्णे दीर्घः) + आप्नोति
पदच्छेद
यः , तु ,आत्मरतिः , एव , स्यात् , आत्मतृप्तः , च, मानवः , आत्मनि , एव , च , सन्तुष्टः , तस्य , कार्यम् , न , विद्यते
न , एव , तस्य , कृतेन , अर्थः , न , अकृतेन , इह , कश्चन , न , च , अस्य , सर्वभूतेषु , कश्चित् , अर्थव्यपाश्रयः
तस्मात् , असक्तः , सततम् , कार्यम् , कर्म , समाचर , असक्तः , हि , आचरन् , कर्म , परम , आप्नोति , पूरुषः
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| यः | यद् | द् – सर्व , पु , १ , एक | The one who |
| आत्मरतिः | आत्मरति | इ , पु , १, एक | Rejoices in Self |
| आत्मतृप्तः | आत्मतृप्त | अ , पु , १ , एक | Fulfilled in Self |
| मानवः | मानव | अ , पु , १ , एक | Man |
| आत्मनि | आत्मन् | न् , पु , ७ , एक | In Self |
| सन्तुष्टः | सन्तुष्ट | अ , पु , १ , एक | Content |
| तस्य | तत् | त् – सर्व , पु , ६ , एक | His |
| कार्यम् | कार्य | अ , नपु , १ , एक | Work |
| कृतेन | कृत | अ , पु , ३, एक | By Action |
| अर्थः | अर्थ | अ , पु , १ , एक | Gain |
| अकृतेन | अकृतेन | अ , पु , ३, एक | By inaction |
| अस्य | इदम् | म् – सर्व , पु , ६ , एक | His |
| सर्वभूतेषु | सर्वभूत | अ , पु , ७, ब | In all beings |
| अर्थव्यपाश्रयः | अर्थव्यपाश्रय | अ , पु , १, एक | Dependence for any gain |
| तस्मात् | तत् | त् – सर्व , पु , ५ , एक | Therefore |
| कर्म | कर्मन् | न् , नपु , १ , एक | Action |
| समाचर | समाचरन् | न् , नपु , १ , एक | perform |
| असक्तः | असक्त | अ , पु , १ , एक | Unattached |
| आचरन् | आचरत् | त् , पु , १ , एक | While performing |
| पूरुषः | पूरुष | अ , पु , १ , एक | Man |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| तु | But |
| एव | Only |
| च | And |
| न | Not |
| इह | Here |
| हि | Indeed |
| कश्चन | Any |
| कश्चित् | Any |
| सततम् | constantly |
| परम | highest |
अन्वयः
यः मानवः तु आत्मरतिः एव आत्मतृप्तः च आत्मनि एव च सन्तुष्टः स्यात् , तस्य कार्यम् न विद्यते ।
तस्य कृतेन अर्थः न एव । इह अकृतेन कश्चन न । अस्य सर्वभूतेषु कश्चित् अर्थव्यपाश्रयः च न ।
तस्मात् असक्तः कार्यम् कर्म सततम् समाचर । हि असक्तः (सन्) कर्म आचरन् पूरुषः परम आप्नोति ।
The one man who rejoices in Self, satisfied with Self, content in Self alone, there is nothing to be done for him. For him, there is nothing to be gained by action or inaction. To such a person, there is no dependency on anything or anyone else. Therefore, always perform duties efficiently, without attachment. Performing duties without attachment, man indeed attains supreme.
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ ३-२०॥
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ ३-२१॥
सन्धिः
कर्मणैव = कर्मणा (वृद्धिरेचि) + एव
संसिद्धिमास्थिता जनकादयः = संसिद्धिम् + आस्थिताः (हलि सर्वेषाम्) + जनकादयः
लोकसङ्ग्रहमेवापि = लोकसङ्ग्रहम् + एव (अकः सवर्णे दीर्घः) + अपि
यद्यदाचरति = यत् (झलां जशोऽन्ते) + यत् (झलां जशोऽन्ते, अकः सवर्णे दीर्घः) + आचरति
श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः = श्रेष्ठः (विसर्जनीयस्य सः) + तत् + तत् (झलां जशोऽन्ते) + एव (आद्गुणः) + इतरः (हशि च , आद्गुणः) + जनः
स यत्प्रमाणं = सः (एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि) + यत् + प्रमाणं
लोकस्तदनुवर्तते = लोकः (विसर्जनीयस्य सः) + तत् (झलां जशोऽन्ते) + अनुवर्तते
पदच्छेद
कर्मणा , एव , हि , संसिद्धिम् , आस्थिताः , जनकादयः , लोकसङ्ग्रहम् , एव , अपि , सम्पश्यन् , कर्तुम् , अर्हसि
यत् , यत् , आचरति , श्रेष्ठः , तत् , तत् , एव , इतरः , जनः , सः , यत् , प्रमाणम् , कुरुते , लोकः , तत् , अनुवर्तते
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| कर्मणा | कर्मन् | न् , नपु , ३ , एक | By action |
| संसिद्धिम् | संसिद्धि | अ , पु , २, एक | Perfection |
| आस्थिताः | आस्थित | अ , पु , १ , ब | Attained |
| जनकादयः | जनकादय | अ , पु , १, एक | Janak etc |
| लोकसङ्ग्रहम् | लोकसङ्ग्रह | अ , नपु , २ , एक | Benefit of masses |
| सम्पश्यन् | सम्पश्यत् | त् , पु , १ , एक | With perspective, view |
| यत् | यद् | द् – सर्व , नपु , १ , एक | Whatever |
| श्रेष्ठः | श्रेष्ठ | अ , पु , १, एक | A great man |
| तत् | तत् | त् – सर्व , नपु , १ , एक | That |
| इतरः | इतर | अ , पु , १, एक | Other |
| जनः | जन | अ , पु , १, एक | People |
| सः | तत् | त् – सर्व , पु , | He |
| प्रमाणम् | प्रमाण | अ , पु , २, एक | demonstrates |
| लोकः | लोक | अ , पु , १, एक | World |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| एव | Only |
| हि | indeed |
| अपि | Even |
| कर्तुम् | To Perform |
अन्वयः
जनकादयः कर्मणा एव हि संसिद्धिम् आस्थिताः । लोकसङ्ग्रहम् सम्पश्यन् एव अपि (त्वम्) (कर्म) कर्तुम् (इह) अर्हसि ।
श्रेष्ठः यत् यत् आचरति , इतरः जनः तत् तत् एव (करोति) । सः (श्रेष्ठः) यत् प्रमाणम् कुरुते , लोकः तत् अनुवर्तते ।
Janak etc. attained perfection only through actions alone. Even with a view of benefit of the world, you should perform action. Whatever a great man does, other people also do that. Whichever standards he (great man) establishes, world follows that.
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ ३-२२॥
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ३-२३॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ ३-२४॥
सन्धिः
पार्थास्ति = पार्थ (अकः सवर्णे दीर्घः) + अस्ति
नानवाप्तमवाप्तव्यं = न (अकः सवर्णे दीर्घः) + अनवाप्तम् + अवाप्तव्यं
वर्त एव = वर्ते (एचोऽयवायावः, लोपः शाकल्यस्य) + एव
ह्यहं = हि (इको यणचि) + अहं
कर्मण्यतन्द्रितः = कर्मणि (इको यणचि) + अतन्द्रितः
वर्त्मानुवर्तन्ते = वर्त्म (अकः सवर्णे दीर्घः) + अनुवर्तन्ते
उत्सीदेयुरिमे = उत्सीदेयुः (ससजुषो रुः) + इमे
लोका न = लोकाः (हलि सर्वेषाम्) + न
चेदहम् = चेत् (झलां जशोऽन्ते) + अहम्
पदच्छेद
न , मे , पार्थ , अस्ति , कर्तव्यम् , त्रिषु , लोकेषु , किञ्चन , न , अनवाप्तम् , अवाप्तव्यम् , वर्ते , एव , च , कर्मणि
यदि , हि , अहम् , न , वर्तेयम् , जातु , कर्मणि , अतन्द्रितः , मम , वर्त्म , अनुवर्तन्ते , मनुष्याः , पार्थ , सर्वशः
उत्सीदेयुः , इमे , लोकाः , न , कुर्याम् , कर्म , चेत् , अहम् , सङ्करस्य , च , कर्ता , स्याम् , उपहन्याम् , इमाः , प्रजाः
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| मे | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ४, एक | For me |
| पार्थ | पार्थ | अ , पु , सं , एक | Paarth (Arjun) |
| कर्तव्यम् | कर्तव्य | अ , नपु , १ , एक | To be done |
| त्रिषु | त्रि | इ , नपु , ७ , ब | In all three |
| लोकेषु | लोक | अ , पु , ७ , ब | In worlds |
| अनवाप्तम् | अनवाप्त | अ , नपु , १ , एक | Unattained |
| अवाप्तव्यम् | अवाप्तव्य | अ , नपु , २ , एक | To be attained |
| कर्मणि | कर्मन् | न् , नपु , ७ , एक | In action |
| अहम् | अस्मद् | द् – सर्व , NA , १, एक | I |
| अतन्द्रितः | अतन्द्रित | अ , पु , १ , एक | Continuously / tirelessly |
| मम | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ६, एक | My |
| वर्त्म | वर्त्मन् | न् , नपु , १ , एक | Path |
| मनुष्याः | मनुष्य | अ , पु , १ , ब | Men |
| इमे | इदम् | म् – सर्व , पु , १ , ब | These |
| लोकाः | लोक | अ , पु , १ , ब | worlds |
| कर्म | कर्मन् | न् , नपु , १ , एक | action |
| सङ्करस्य | सङ्कर | अ , पु , ६ , एक | Confusion / admixture of castes / roles |
| कर्ता | कर्ता | आ , स्त्री , १ , एक | Actor / cause |
| इमाः | इदम् | म् – सर्व , स्त्री , १ , ब | These |
| प्रजाः | प्रजा | आ , स्त्री , १ , ब | beings |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| अस्ति | अस् , २ , प , लट् , प्र , एक | (He) exists |
| वर्ते | वृत् , १ , आ , लट् , उ , एक | (I) engage |
| वर्तेयम् | वृत् , १० , प , लिङ् , उ , एक | (I) must engage |
| उत् – सीदेयुः | सद् , १ , प , लिङ् , प्र , ब | (They) would destroy |
| कुर्याम् | कृ , ८ , प , लिङ् , उ , एक | (I) would do |
| उप – हन्याम् | हन् , २ , प , लिङ् , उ , एक | (I) would destroy |
| अनु-वर्तन्ते | वृत् , १ , आ , लट् , प्र , ब | (They) follow |
| स्याम् | अस् , २ , प , लिङ् , उ , एक | (I) would |
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| न | Not |
| किञ्चन | Slightest, even a little bit |
| एव | Only |
| च | And |
| यदि | If |
| जातु | Ever / Continuously |
| सर्वशः | All |
| हि | Indeed |
| चेत् | If |
अन्वयः
(हे) पार्थ , मे त्रिषु लोकेषु कर्तव्यं किञ्चन न अस्ति । अनवाप्तम् अवाप्तव्यम् न (अस्ति) , (तथापि) (अहम्) कर्मणि वर्ते एव च ।
(हे) पार्थ , अहम् जातु अतन्द्रितः (सन्) यदि कर्मणि न वर्तेयम् हि , मनुष्याः सर्वशः मम वर्त्म अनुवर्तन्ते ।
अहम् कर्म न कुर्याम् चेत् इमे लोकाः उत्सीदेयुः । (अहम्) सङ्करस्य कर्ता (अपि) स्याम् इमाः प्रजाः उपहन्याम् च ।
Hey Parth, I have no duty in all three worlds. There is nothing to be attained that is not attained. Still I continue to act.
Hey Parth, If I do not engage myself continuously without relaxation, all mankind will follow me.
If I would not perform my actions, I would destroy these worlds. I would be the cause of confusion of roles and also would destroy these beings.
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥ ३-२५॥
सन्धिः
कर्मण्यविद्वांसो यथा = कर्मणि (इको यणचि) + अविद्वांसः (हशि च, आद्गुणः) + यथा
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् = कुर्यात् (झलां जशोऽन्ते) + विद्वान् (नश्छव्यप्रशान्) + तथा (अकः सवर्णे दीर्घः) + असक्तः (विसर्जनीयस्य सः, स्तोः श्चुना श्चुः) + चिकीर्षुः (ससजुषो रुः) + लोकसङ्ग्रहम्
पदच्छेद
सक्ताः , कर्मणि , अविद्वांसः , यथा , कुर्वन्ति , भारत , कुर्यात् , विद्वान् , तथा , असक्तः , चिकीर्षुः , लोकसङ्ग्रहम्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| सक्ताः | सक्त | अ , पु , १ , ब | Attached |
| कर्मणि | कर्मन् | न् , नपु , ७ , एक | In action |
| अविद्वांसः | अविद्वस् | स् , पु , १ , ब | Ignorant men |
| भारत | भारत | अ , पु , सं , एक | Bharat (Arjun) |
| विद्वान् | विद्वस् | स् , पु , १ , एक | Wise man |
| असक्तः | असक्त | अ , पु , १ , एक | Unattached) |
| चिकीर्षुः | चिकीर्षु | उ , पु , १ , एक | wishing |
| लोकसङ्ग्रहम् | लोकसङ्ग्रह | अ , नपु , २ , एक | Benefit of masses |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| यथा | Just like |
| तथा | So as |
अन्वयः
(हे) भारत , कर्मणि सक्ताः अविद्वांसः यथा (कर्म) कुर्वन्ति , तथा लोकसङ्ग्रहम् चिकीर्षुः विद्वान् असक्तः (सन्) (नियतम् कर्म) कुर्यात् ।
Hey Bharat, just like an ignorant man acts with attachment to action, wise man must act, wishing the welfare of the world, unattached.
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ ३-२६॥
सन्धिः
जनयेदज्ञानां = जनयेत् (झलां जशोऽन्ते) + अज्ञानां
पदच्छेद
न , बुद्धिभेदम् , जनयेत् , अज्ञानाम् , कर्मसङ्गिनाम् , जोषयेत् , सर्वकर्माणि , विद्वान् , युक्तः , समाचरन्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| बुद्धिभेदम् | बुद्धिभेद | अ , नपु , २, एक | Disturbance in minds |
| अज्ञानाम् | अज्ञान | अ , नपु , ६ , ब | Of ignorant |
| कर्मसङ्गिनाम् | कर्मसङ्गिन | अ , नपु , ६ , ब | Of ones who are attached to action |
| सर्वकर्माणि | सर्वकर्मन् | न् , नपु , २ , ब | All actions |
| विद्वान् | विद्वस् | स् , पु , १ , एक | Wise man |
| युक्तः | युक्त | अ , पु , १ , एक | balanced |
| समाचरन् | समाचरन् | न् , नपु , १ , एक | perform |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| न | Not |
अन्वयः
विद्वान् कर्मसङ्गिनाम् अज्ञानाम् बुद्धिभेदम् न जनयेत् । विद्वान् युक्तः समाचरन् सर्वकर्माणि जोषयेत् ।
Wise man should not unsettle minds of ignorant who are attached to action. Wise man should engage them in all action, himself performing in a balanced way.
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ ३-२७॥
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥ ३-२८॥
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ ३-२९॥
सन्धिः
कर्ताहमिति = कर्ता (अकः सवर्णे दीर्घः) + अहम् + इति
गुणा गुणेषु = गुणाः (हलि सर्वेषाम्) + गुणेषु
वर्तन्त इति = वर्तन्ते (एचोऽयवायावः, लोपः शाकल्यस्य) + इति
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः = प्रकृतेः (ससजुषो रुः) + गुणसम्मूढाः
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न = तान् + अकृत्स्नविदः (हशि च, आद्गुणः) + मन्दान् + कृत्स्नवित् (यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा) + न
पदच्छेद
प्रकृतेः , क्रियमाणानि , गुणैः , कर्माणि , सर्वशः , अहङ्कारविमूढात्मा , कर्ता , अहम् , इति , मन्यते
तत्त्ववित्त , तु , महाबाहो , गुणकर्मविभागयोः , गुणाः , गुणेषु , वर्तन्ते , इति , मत्वा , न , सज्जते
प्रकृतेः , गुणसम्मूढाः , सज्जन्ते , गुणकर्मसु , तान् , अकृत्स्नविदः , मन्दान् , कृत्स्नवित् , न , विचालयेत्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| प्रकृतेः | प्रकृति | इ , पु , ६ , एक | Of nature |
| क्रियमाणानि | क्रियमान् | अ , नपु , २ , ब | Are performed |
| गुणैः | गुण | अ , पु , ३ , ब | By qualities |
| कर्माणि | कर्मन् | न् , नपु , १ , ब | actions |
| अहङ्कारविमूढात्मा | अहङ्कारविमूढात्मन् | न् , पु , १ , एक | One with mind deluded due to egoism |
| कर्ता | कर्ता | आ , स्त्री , १ , एक | doer |
| अहम् | अस्मद् | द् – सर्व , NA , एक | I |
| तत्त्ववित्त | तत्त्ववित्त | त् , पु , १ , एक | Knower of Truth |
| महाबाहो | महाबाहु | उ , पु , सं , एक | Mighty armed (Arjun) |
| गुणकर्मविभागयोः | गुणकर्मविभाग | अ , पु , ६ , द्वि | Of divisions of nature and qualities |
| गुणाः | गुण | अ , पु , १ , ब | Qualities (of nature) |
| गुणेषु | गुण | अ , पु , ७ , ब | In qualities (of nature) |
| गुणसम्मूढाः | गुणसम्मूढ | अ , पु , १ , ब | (Person) deluded by qualities (of nature) |
| गुणकर्मसु | गुणकर्मन् | न् , नपु , ७ , ब | In actions of qualities (of nature) |
| तान् | तत् | त् – सर्व , पु , २ , ब | Those |
| अकृत्स्नविदः | अकृत्स्नवित् | त् , पु , २ , ब | One with imperfect knowledge |
| मन्दान् | मन्द | अ , पु , २ , ब | Foolish, with poor intellect |
| कृत्स्नवित् | कृत्स्नवित् | त् , पु , १ , एक | One with perfect knowledge |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| मन्यते | मन् , ४ , प , प्र , एक | (He) believes |
| वर्तन्ते | वृत् , १ , आ , प्र , ब | (They) remain |
| सज्जते | सज्ज् , १ , आ , प्र , एक | (He) goes / attaches |
| सज्जन्ते | सज्ज् , १ , आ , प्र , ब | (They) go / attach |
| वि-चालयेत् | चल् , १ , प , प्र , एक | (He) should unsettle |
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| सर्वशः | All |
| इति | thus |
| तु | but |
| मत्वा | Having known |
| न | Not |
अन्वयः
अहङ्कारविमूढात्मा प्रकृतेः गुणैः सर्वशः क्रियमाणानि कर्माणि अहम् कर्ता इति मन्यते ।
(हे) महाबाहो , गुणकर्मविभागयोः तत्त्ववित्त गुणाः गुणेषु वर्तन्ते तु (न आत्मा) , इति मत्वा न सज्जते ।
प्रकृतेः गुणसम्मूढाः गुणकर्मसु सज्जन्ते । अकृत्स्नविदः तान् मन्दान् कृत्स्नवित् न विचालयेत् ।
All actions are performed by qualities of nature. “I am the doer”, think thus, the one with deluded mind.
Oh, mighty armed, knower of truth of qualities of nature and their functions, knowing that qualities of nature (senses) remain in qualities of nature (as sense object), is not attached.
Those deluded by qualities of nature are attached to actions of qualities of nature. Man of perfect knowledge should not unsettle those foolish with imperfect knowledge.
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ ३-३०॥
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३-३१॥
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३-३२॥
सन्धिः
संन्यस्याध्यात्मचेतसा = संन्यस्य (अकः सवर्णे दीर्घः) + अध्यात्मचेतसा
निराशीर्निर्ममो भूत्वा = निराशीः (ससजुषो रुः) + निर्ममः (हशि च, आद्गुणः) + भूत्वा
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते = श्रद्धावन्तः (अतो रोरप्लुतादप्लुते) + अनसूयन्तः (हशि च, आद्गुणः) + मुच्यन्ते
तेऽपि = ते (एङः पदान्तादति) + अपि
त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति = तु (इको यणचि) + एतत् (झलां जशोऽन्ते) + अभ्यसूयन्तः (हशि च, आद्गुणः) + न (अकः सवर्णे दीर्घः) + अनुतिष्ठन्ति
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि = सर्वज्ञानविमूढान् (नश्छव्यप्रशान्) + तान् + विद्धि
पदच्छेद
मयि , सर्वाणि , कर्माणि , संन्यस्य , अध्यात्मचेतसा , निराशीः , निर्ममः , भूत्वा , युध्यस्व , विगतज्वरः
ये , मे , मतम् , इदम् , नित्यम् , अनुतिष्ठन्ति , मानवाः , श्रद्धावन्तः , अनसूयन्तः , मुच्यन्ते , ते , अपि , कर्मभिः
ये , तु , एतत् , अभ्यसूयन्तः , न , अनुतिष्ठन्ति , मे , मतम् , सर्वज्ञानविमूढान् , तान् , विद्धि , नष्टान् , अचेतसः
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| मयि | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ७ , एक | In me |
| सर्वाणि | सर्व | अ – सर्व , नपु , २ , ब | All |
| कर्माणि | कर्माणि | न् , नपु , २ , ब | Actions |
| अध्यात्मचेतसा | अध्यात्मचेतस् | स् , नपु , ३ , एक | With mind abided in Self |
| निराशीः | निराशी | ई , पु , १ , एक | Free from hope |
| निर्ममः | निर्मम | अ , पु , १ , एक | Without egosim |
| विगतज्वरः | विगतज्वर | अ , पु , १ , एक | Without (mental) fever |
| ये | यद् | द् – सर्व , पु , १ , ब | Those who |
| मे | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , एक | My |
| मतम् | मत | अ , नपु , २ , एक | Opinion / teaching / upadesha |
| इदम् | इदम् | म् – सर्व , नपु , २ , एक | this |
| नित्यम् | नित्य | अ , नपु , २ , एक | continuously |
| मानवाः | मानव | अ , पु , १ , ब | Men |
| श्रद्धावन्तः | श्रद्धावत् | त् , पु , १ , ब | Full of faith |
| अनसूयन्तः | अनसूयन् | न् , पु , १ , ब | Without excuses |
| ते | तत् | त् – सर्व , पु , १ , ब | They |
| कर्मभिः | कर्मन् | न् , नपु , ३ , ब | Through actions |
| एतत् | एतत् | त् – सर्व , नपु , १ , एक | This |
| अभ्यसूयन्तः | अभ्यसूयन् | न् , पु , १ , ब | Full of excuses |
| सर्वज्ञानविमूढान् | सर्वज्ञानविमूढ | अ , पु , २ , ब | Deluded of all knowledge |
| तान् | तत् | त् – सर्व , पु , २ , ब | Them |
| नष्टान् | नष्ट | अ , पु , २ , ब | ruined |
| अचेतसः | अचेतस् | स् , पु , २ , ब | Lack of discrimination |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| युध्यस्व | युध् , ४ , आ , लोट् , म , एक | (You) fight |
| अनु-तिष्ठन्ति | स्था , १ , प , लट् , प्र , ब | (They) practice |
| मुच्यन्ते | मुच् , ६ , आ , लट् , प्र , ब | (They) are freed |
| विद्धि | विद् , २ , प , लोट् , म , एक | (You) know |
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| भूत्वा = भू + त्वा (कृदन्त – भू + क्त्वान्त) | Having become |
| संन्यस्य = सम् + नि + अस् + य (कृदन्त – उपसर्ग + अस् + ल्यबन्त) | Having renounced |
| अपि | Also |
| तु | But |
| न | Not |
अन्वयः
सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य अध्यात्मचेतसा निराशीः निर्ममः विगतज्वरः भूत्वा युध्यस्व ।
ये श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः मानवाः मे इदम् मतम् नित्यम् अनुतिष्ठन्ति , ते अपि कर्मभिः मुच्यन्ते ।
ये तु एतत् मे मतम् अभ्यसूयन्तः न अनुतिष्ठन्ति , सर्वज्ञानविमूढान् अचेतसः तान् नष्टान् विद्धि ।
Having renounced all actions in me, with mind abided in Self, having become free from (futuristic) hope, without egoism and (mental) fever, you fight.
Those men, who are full of faith, practice this teaching of mine continuously, without any excuses, they too are freed in action.
But those, who finds excuses, does not practice this teaching of mine, deluded of all knowledge with lack of discrimination, know them to be ruined.
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३-३३॥
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३-३४॥
सन्धिः
प्रकृतेर्ज्ञानवानपि = प्रकृतेः (ससजुषो रुः) + ज्ञानवान् + अपि
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे = इन्द्रियस्य (आद्गुणः) + इन्द्रियस्य (अकः सवर्णे दीर्घः) + अर्थे
तयोर्न = तयोः (ससजुषो रुः) + न
ह्यस्य = हि (इको यणचि) + अस्य
पदच्छेद
सदृशम् , चेष्टते , स्वस्याः , प्रकृतेः , ज्ञानवान् , अपि , प्रकृतिम् , यान्ति , भूतानि , निग्रहः , किम् , करिष्यति
इन्द्रियस्य , इन्द्रियस्य , अर्थे , रागद्वेषौ , व्यवस्थितौ , तयोः , न , वशम् , आगच्छेत् , तौ , हि , अस्य , परिपन्थिनौ
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| सदृशम् | सदृश | अ , नपु , २ , एक | accordingly |
| स्वस्याः | स्वस्य | अ , पु , १ , ब | Their |
| प्रकृतेः | प्रकृति | इ , पु , ६ , एक | Of nature |
| ज्ञानवान् | ज्ञानवत् | त् , पु , १ , एक | Wise man |
| प्रकृतिम् | प्रकृति | इ , पु , २ , एक | Nature |
| भूतानि | भूत | अ , नपु , १ , ब | Beings |
| निग्रहः | निग्रह | अ , पु , १ , एक | Control |
| किम् | किम् | म् – सर्व , नपु , | What |
| इन्द्रियस्य | इन्द्रिय | अ , पु , ६ , एक | Of senses |
| अर्थे | अर्थ | अ , पु , ७ , एक | In (sense) object |
| रागद्वेषौ | रागद्वेष | अ , पु , १ , द्वि | Attachment and aversion |
| व्यवस्थितौ | व्यवस्थित | अ , पु , १ , द्वि | seated |
| तयोः | तत् | त् – सर्व , नपु , ६ , द्वि | Of these two |
| वशम् | वशम् | अ , नपु , १ , एक | Control / sway |
| तौ | तत् | त् – सर्व , पु , १ , द्वि | These two |
| अस्य | इदम् | म् – सर्व , पु , ६ , एक | his |
| परिपन्थिनौ | परिपन्थिन् | न् , पु , १ , द्वि | enemies |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| चेष्टते | चेष्ट् , १ , आ , लट् , प्र , एक | (He) acts |
| यान्ति | या , २ , प , लट् , प्र , ब | (They) go |
| करिष्यति | कृ , ८ , प , लृट् , प्र , एक | (He) shall do |
| आ-गच्छेत् | गम् , १ , प , लिङ् , प्र , एक | (He) must come |
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| अपि | Also |
| न | Not |
| हि | Indeed |
अन्वयः
ज्ञानवान् अपि स्वस्याः प्रकृतेः सदृशम् चेष्टते । भूतानि प्रकृतिम् यान्ति । निग्रहः किम् करिष्यति ।
रागद्वेषौ इन्द्रियस्य इन्द्रियस्य अर्थे व्यवस्थितौ । तयोः वशम् न आगच्छेत् । हि तौ अस्य परिपन्थिनौ ।
Even wise man acts per his own nature. Beings follow their nature. What can restraint do?
Attachment and aversion for sense objects are built in the senses. Do not come under the sway of these two. These two are indeed his enemies.
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३-३५॥
सन्धिः
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः = श्रेयान् + स्वधर्मः (हशि च , आद्गुणः) + विगुणः
परधर्मो भयावहः = परधर्मः (हशि च , आद्गुणः) + भयावहः
पदच्छेद
श्रेयान् , स्वधर्मः , विगुणः , परधर्मात् , स्वनुष्ठितात् , स्वधर्मे , निधनम् , श्रेयः , परधर्मः , भयावहः
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| श्रेयान् | श्रेयस् | स् , पु , १ , एक | Better |
| स्वधर्मः | स्वधर्म | अ , पु , १ , एक | Own duty |
| विगुणः | विगुण | अ , पु , १ , एक | devoid of merit |
| परधर्मात् | परधर्म | अ , पु , ५ , एक | Than other’s duty |
| स्वनुष्ठितात् | स्वनुष्ठित | अ , पु , ५ , एक | Than very well done |
| स्वधर्मे | स्वधर्म | अ , पु , ७ , एक | In own duty |
| निधनम् | निधन | अ , नपु , २ , एक | death |
| श्रेयः | श्रेयस् | स् , नपु , १ , एक | Better |
| परधर्मः | परधर्म | अ , पु , १ , एक | Other’s duty |
| भयावहः | भयावह | अ , पु , १ , एक | Full of fear |
अन्वयः
विगुणः स्वधर्मः स्वनुष्ठितात् परधर्मात् श्रेयान् (भवति) । स्वधर्मे निधनम् श्रेयः (भवति) । परधर्मः भयावहः (भवति) ।
One’s own duty is better, though devoid of merit. Better is death in one’s own duty, duty of another is filled with fear.
अर्जुन उवाच ।
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३-३६॥
सन्धिः
अर्जुन उवाच = अर्जुनः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य) + उवाच
प्रयुक्तोऽयं = प्रयुक्तः (अतो रोरप्लुतादप्लुते) + अयं
अनिच्छन्नपि = अनिच्छन् (ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम्) + अपि
बलादिव = बलात् (झलां जशोऽन्ते) + इव
पदच्छेद
अर्जुनः , उवाच , अथ , केन , प्रयुक्तः , अयम् , पापम् , चरति , पूरुषः , अनिच्छन् , अपि , वार्ष्णेय , बलात् , इव , नियोजितः
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| अर्जुनः | अर्जुन | अ , पु , १ , एक | Arjun |
| केन | किम् | म् – सर्व , पु , ३ , एक | By what |
| प्रयुक्तः | प्रयुक्त | अ , पु , १ , एक | Impelled by |
| अयम् | इदम् | म् – सर्व , पु , १ , एक | This |
| पापम् | पाप | अ , नपु , २ , एक | Sin |
| पूरुषः | पूरुष | अ , पु , १ , एक | Man |
| अनिच्छन् | अनिच्छत् | त् , पु , १ , एक | Against wishes |
| वार्ष्णेय | वार्ष्णेय | अ , पु , सं , एक | Varsheya (Shri Krishna) |
| बलात् | बल | अ , नपु , ५ , एक | From force / power |
| नियोजितः | नियोजित | अ , पु , १ , एक | constrained |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| अथ | Thus |
| अपि | Also |
| इव | As if |
अन्वयः
अर्जुनः उवाच – (हे) वार्ष्णेय , अथ अयम् पूरुषः अनिच्छन् अपि केन प्रयुक्तः बलात् नियोजितः इव पापम् चरति ।
Arjun Spoke – Hey Vaarshneya, now this man, against his wishes, impelled by what, as if constrained by force, commits sin.
श्रीभगवानुवाच ।
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३-३७॥
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३-३८॥
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३-३९॥
सन्धिः
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः = कामः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य) + एषः (एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि) + क्रोधः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य) + एषः (एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि) + रजोगुणसमुद्भवः
महाशनो महापाप्मा = महाशनः (हशि च, आद्गुणः) + महापाप्मा
विद्ध्येनमिह = विद्धि (इको यणचि) + एनम् + इह
धूमेनाव्रियते = धूमेन (अकः सवर्णे दीर्घः) + आव्रियते
वह्निर्यथादर्शो मलेन =वह्निः (ससजुषो रुः) + यथा (अकः सवर्णे दीर्घः) + आदर्शः (हशि च, आद्गुणः) + मलेन
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा = यथा (आद्गुणः) + उल्बेन (अकः सवर्णे दीर्घः) + आवृतः (हशि च, आद्गुणः) + गर्भः (विसर्जनीयस्य सः) + तथा
तेनेदमावृतम् = तेन (आद्गुणः) + इदम् + आवृतम्
ज्ञानिनो नित्यवैरिणा = ज्ञानिनः (हशि च, आद्गुणः) + नित्यवैरिणा
दुष्पूरेणानलेन = दुष्पूरेण (अकः सवर्णे दीर्घः) + अनलेन
पदच्छेद
श्रीभगवान् , उवाच , कामः , एषः , क्रोधः , एषः , रजोगुणसमुद्भवः , महाशनः , महापाप्मा , विद्धि , एनम् , इह , वैरिणम्
धूमेन , आव्रियते , वह्निः , यथा , आदर्शः , मलेन , च , यथा , उल्बेन , आवृतः , गर्भः , तथा , तेन , इदम् , आवृतम्
आवृतम् , ज्ञानम् , एतेन , ज्ञानिनः , नित्यवैरिणा , कामरूपेण , कौन्तेय , दुष्पूरेण , अनलेन , च
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| श्रीभगवान् | श्रीभगवत् | त् , पु , १ , एक | Shri Bhagavaan (Lord Krishna) |
| कामः | काम | अ , पु , १ , एक | desire |
| एषः | एतत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | this |
| क्रोधः | क्रोध | अ , पु , १ , एक | anger |
| रजोगुणसमुद्भवः | रजोगुणसमुद्भव | अ , पु , १ , एक | Born out of agitations |
| महाशनः | महाशन | अ , पु , १ , एक | All devouring |
| महापाप्मा | महापाप्मा | आ , स्त्री , १ , एक | Very sinful |
| एनम् | एतत् | त् – सर्व , पु , २ , एक | this |
| वैरिणम् | वैरिन् | न् , पु , २ , एक | enemy |
| धूमेन | धूम | अ , पु , ३ , एक | By smoke |
| वह्निः | वह्नि | इ , पु , १ , एक | fire |
| आदर्शः | आदर्श | अ , पु , १ , एक | mirror |
| मलेन | मल | अ , पु , ३ , एक | By dirt |
| उल्बेन | उल्ब | अ , पु , ३ , एक | By womb |
| गर्भः | गर्भ | अ , पु , १ , एक | embryo |
| आवृतः | आवृत | अ , पु , १ , एक | covers |
| तेन | तत् | त् – सर्व , पु , ३ , एक | By that |
| इदम् | इदम् | म् – सर्व , नपु , १ , एक | this |
| आवृतम् | आवृत | अ , पु , १ , एक | covers |
| ज्ञानम् | ज्ञान | अ , नपु , २ , एक | wisdom |
| एतेन | एतत् | त् – सर्व , पु , ३ , एक | By this |
| ज्ञानिनः | ज्ञानिन् | न् , पु , ६ , ब | Of wise men |
| नित्यवैरिणा | नित्यवैरिन् | न् , पु , ३ , एक | By eternal enemy |
| कामरूपेण | कामरूप | अ , पु , ३ , एक | By the form of desire |
| कौन्तेय | कौन्तेय | अ , पु , सं , एक | Kounteya (Arjun) |
| दुष्पूरेण | दुष्पूर | अ , पु , ३ , एक | By unquenchable |
| अनलेन | अनल | अ , पु , ३ , एक | By fire |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| इह | here |
| यथा | Just like |
| च | and |
| तथा | So as |
अन्वयः
श्रीभगवान् उवाच – रजोगुणसमुद्भवः महाशनः महापाप्मा एषः कामः एषः क्रोधः , एनम् इह वैरिणम् विद्धि ।
यथा वह्निः धूमेन , आदर्शः मलेन च आव्रियते , यथा गर्भः उल्बेन आवृतः , तथा इदम् तेन आवृतम् ।
(हे) कौन्तेय , ज्ञानिनः नित्यवैरिणा एतेन कामरूपेण दुष्पूरेण अनलेन च ज्ञानम् आवृतम् (भवति) |
Lord spoke – It is the desire, anger, born out of agitations of mind, all devouring and sinful, know this as enemy.
How fire is covered with smoke, mirror is covered with dust, embryo is covered with womb, like that this (wisdom) is covered by that (desire).
Hey Kounteya, Wisdom is covered in the form of desire that is unappeasable fire that is eternal enemy of wise man.
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ३-४०॥
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ३-४१॥
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ३-४२॥
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ३-४३॥
सन्धिः
मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते = मनः (हशि च, आद्गुणः) + बुद्धिः (ससजुषो रुः) + अस्य (अकः सवर्णे दीर्घः) + अधिष्ठानम् + उच्यते
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य = एतैः (ससजुषो रुः) + विमोहयति (इको यणचि) + एषः (एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि) + ज्ञानम् + आवृत्य
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ = तस्मात् + त्वम् + इन्द्रियाणि (इको यणचि) + आदौ
ह्येनं = हि (इको यणचि) + एनम्
पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः = पराणि (इको यणचि) + आहुः (ससजुषो रुः) + इन्द्रियेभ्यः
मनसस्तु = मनसः (विसर्जनीयस्य सः) + तु
बुद्धिर्यो बुद्धेः = बुद्धिः (ससजुषो रुः) + यः (हशि च, आद्गुणः) + बुद्धेः
परतस्तु = परतः (विसर्जनीयस्य सः) + तु
संस्तभ्यात्मानमात्मना = संस्तभ्य (अकः सवर्णे दीर्घः) + आत्मानम् + आत्मना
पदच्छेद
इन्द्रियाणि , मनः , बुद्धिः , अस्य , अधिष्ठानम् , उच्यते , एतैः , विमोहयति , एषः , ज्ञानम् , आवृत्य , देहिनम्
तस्मात् , त्वम् , इन्द्रियाणि , आदौ , नियम्य , भरतर्षभ , पाप्मानम् , प्रजहि , हि , एनम् , ज्ञानविज्ञाननाशनम्
इन्द्रियाणि , पराणि , आहुः , इन्द्रियेभ्यः , परम् , मनः , मनसः , तु , परा , बुद्धिः , यः , बुद्धेः , परतः , तु , सः
एवम् , बुद्धेः , परम् , बुद्ध्वा , संस्तभ्य , आत्मानम् , आत्मना , जहि , शत्रुम् , महाबाहो , कामरूपम् , दुरासदम्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| इन्द्रियाणि | इन्द्रिय | अ , नपु , १ , ब | Senses |
| मनः | मनस् | स् , नपु , १ , एक | Mind |
| बुद्धिः | बुद्धि | इ , स्त्री , १ , एक | Intellect |
| अस्य | इदम् | म् – सर्व , नपु , ६ , एक | its |
| अधिष्ठानम् | अधिष्ठान | अ , नपु , २ , एक | seat |
| एतैः | एतत् | त् – सर्व , पु , ३ , ब | By these |
| एषः | एतत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | this |
| ज्ञानम् | ज्ञान | अ , नपु , २ , एक | wisdom |
| देहिनम् | देहिन् | न् , पु , २ , एक | embodied |
| तस्मात् | तत् | त् – सर्व , पु , ५ , एक | Therefore |
| त्वम् | युष्मद् | द् – सर्व , NA , १ , एक | You |
| आदौ | आदि | इ , पु , ७ , एक | In the begining |
| भरतर्षभ | भरतर्षभ | अ , पु , सं , एक | Best of Bharat (Arjun) |
| पाप्मानम् | पाप्मन् | न् , पु , २, एक | sinful |
| एनम् | एतत् | त् – सर्व , पु , २ , एक | this |
| ज्ञानविज्ञाननाशनम् | ज्ञानविज्ञाननाशन | अ , पु , २ , एक | Destroyer of scared and worldly knowledge |
| पराणि | पर | अ , नपु , १ , ब | superior |
| इन्द्रियेभ्यः | इन्द्रिय | अ , नपु , ५ , ब | Than senses |
| परम् | पर | अ , नपु , १ , एक | superior |
| मनः | मनस् | स् , नपु , १ , एक | Mind |
| मनसः | मनस् | स् , नपु , ५ , एक | Than mind |
| परा | परा | आ , स्त्री , १ , एक | superior |
| बुद्धिः | बुद्धि | इ , स्त्री , १ , एक | intellect |
| यः | यद् | द् – सर्व , पु , १ , एक | The one who |
| बुद्धेः | बुद्धि | इ , स्त्री , ५ , एक | Than the intellect |
| परतः | परत् | त् , पु , ५ , एक | superior |
| सः | तत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | He |
| आत्मानम् | आत्मन् | न् , पु , २ , एक | The Self |
| आत्मना | आत्मन् | न् , पु , ३ , एक | By the Self |
| शत्रुम् | शत्रु | अ , नपु , २ , एक | enemy |
| महाबाहो | महाबाहु | अ , पु , सं , एक | Mighty armed (Arjun) |
| कामरूपम् | कामरूप | न् , पु , २ , एक | Of the form of desire |
| दुरासदम् | दुरासद | न् , पु , २ , एक | Hard to conquer |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
| पद | Translation |
|---|---|
| आवृत्य | Having covered |
| नियम्य | Having controlled |
| हि | indeed |
| तु | But |
| एवम् | Thus |
| बुद्ध्वा | Having known |
| संस्तभ्य | Having restrained |
अन्वयः
इन्द्रियाणि मनः बुद्धिः अस्य अधिष्ठानम् उच्यते । एषः एतैः ज्ञानम् आवृत्य देहिनम् विमोहयति ।
(हे) भरतर्षभ , तस्मात् त्वम् आदौ इन्द्रियाणि नियम्य ज्ञानविज्ञाननाशनम् पाप्मानम् एनम् प्रजहि हि ।
इन्द्रियाणि पराणि आहुः । मनः इन्द्रियेभ्यः परम् (भवति) । बुद्धिः तु मनसः परा (भवति)। यः बुद्धेः तु परतः सः (आत्मा) (भवति) ।
(हे) महाबाहो , एवम् (आत्मानम्) बुद्धेः परम् बुद्ध्वा आत्मना आत्मानम् संस्तभ्य दुरासदम् कामरूपम् शत्रुम् जहि ।
Senses, mind and intellect are said to be its seat. Having covered this wisdom, these deludes the embodied.
Oh, best of Bharat, having controlled senses in the beginning, you indeed kill this sinful destroyer of sacred and worldly knowledge.
It is said that senses are superior (than body). Mind is superior than senses. But Intellect is superior than mind.
Oh, mighty armed, thus having known (Self as) superior than intellect, having restrained the self by the Self, kill this hard to conquer enemy of the form of desire.