अर्जुन उवाच ।
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १२-१॥
सन्धिः
अर्जुन उवाच = अर्जुनः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य) + उवाच
सततयुक्ता ये = सततयुक्ताः (हलि सर्वेषाम्) + ये
भक्तास्त्वां = भक्ताः (विसर्जनीयस्य सः) + त्वाम्
चाप्यक्षरमव्यक्तं = च (अकः सवर्णे दीर्घः) + अपि (इको यणचि) + अक्षरम् + अव्यक्तम्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| अर्जुनः | अर्जुन | अ , पु , १ , एक | Arjun |
| सततयुक्ताः | सततयुक्त | अ , पु , १ , ब | Ever steadfast |
| ये | यद् | द् – सर्व , पु , १ , ब | Those who |
| भक्ताः | भक्त | अ , पु , १ , ब | Devotees |
| त्वाम् | युष्मद् | द् – सर्व , NA , २ , एक | You |
| अक्षरम् | अक्षर | अ , नपु , २ , एक | imperishable |
| अव्यक्तम् | अव्यक्त | अ , नपु , २ , एक | unmanifested |
| तेषाम् | तत् | त् – सर्व , पु , ६ , ब | Of those |
| के | किम् | म् – सर्व , पु , १ , ब | Who are |
| योगवित्तमाः | योगवित्तम | अ , पु , १ , ब | Better in Yoga |
पदपरिचय – तिङ्न्त
अन्वयः
अर्जुनः उवाच । एवम् सततयुक्ताः ये भक्ताः त्वाम् पर्युपासते । ये अक्षरम् अव्यक्तम् च अपि पर्युपासते । तेषाम् के योगवित्तमाः ?
Arjun spoke – Those devotees who, ever steadfast, worship you. Also those who worship the imperishable, unmanifested. Amongst them, who are better in yoga?
श्रीभगवानुवाच ।
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेताः ते मे युक्ततमा मताः ॥ १२-२॥
सन्धिः
श्रीभगवानुवाच = श्रीभगवान् + उवाच
मय्यावेश्य = मयि (इको यणचि) + आवेश्य
मनो ये = मनः (हशि च, आद्गुणः) + ये
नित्ययुक्ता उपासते = नित्ययुक्ताः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य) + उपासते
परयोपेताः = परया (आद्गुणः) + उपेताः
युक्ततमा मताः = युक्ततमाः (हलि सर्वेषाम्) + मताः
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| श्रीभगवान् | श्रीभगवत् | त् , पु , १ , एक | Shri Bhagavaan (Lord Krishna) |
| मयि | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ७ , एक | In me |
| मनः | मनस् | स् , नपु , १ , एक | Mind |
| ये | यद् | द् – सर्व , पु , १ , ब | Those who |
| माम् | अस्मद् | द् – सर्व , NA , २ , एक | me |
| नित्ययुक्ताः | नित्ययुक्त | अ , पु , १ , ब | Ever steadfast |
| श्रद्धया | श्रद्धा | आ , स्त्री , ३ , एक | With faith |
| परया | परा | आ , स्त्री , ३ , एक | supreme |
| उपेताः | उपेत | अ , पु , १ , ब | Endowed with |
| ते | तत् | त् – सर्व , पु , १ , ब | They |
| मे | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , एक | My |
| युक्ततमाः | युक्ततम | अ , पु , १ , ब | Best in Yoga |
| मताः | मत | अ , पु , १ , ब | Opinion |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय :
आवेश्य = आ + विश् + य = Having possessed / fixated
(कृदन्त = उपसर्ग + धातु + ल्यबन्त)
अन्वयः
श्रीभगवान् उवाच । ये मयि मनः आवेश्य नित्ययुक्ताः परया श्रद्धया उपेताः माम् उपासते , ते युक्ततमाः मे मताः ।
Shri Bhagavan spoke – Those who worship me, fixing their mind on me, ever steadfast, endowed with supreme devotion, they are best in yoga in my opinion.
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यञ्च कूटस्थमचलन्ध्रुवम् ॥ १२-३॥
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ १२-४॥
सन्धिः
त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं = तु (इको यणचि) + अक्षरम् + अनिर्देश्यम् + अव्यक्तम्
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं = सन्नियम्य (आद्गुणः) + इन्द्रियग्रामम्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| ये | यद् | द् – सर्व , पु , १ , ब | Those who |
| अक्षरम् | अक्षर | अ , नपु , २ , एक | imperishable |
| अनिर्देश्यम् | अनिर्देश्य | अ , नपु , २ , एक | undefinable |
| अव्यक्तम् | अव्यक्त | अ , नपु , २ , एक | unmanifested |
| सर्वत्रगम् | सर्वत्रग | अ , नपु , २ , एक | All pervading / omnipresent |
| अचिन्त्यम् | अचिन्त्य | अ , नपु , २ , एक | unthinkable |
| कूटस्थम् | कूटस्थ | अ , नपु , २ , एक | unchangeable |
| अचलन् | अचलत् | त् , पु , १ , एक | steady |
| ध्रुवम् | ध्रुवम् | अ , नपु , २ , एक | eternal |
| इन्द्रियग्रामम् | इन्द्रियग्राम | अ , नपु , २ , एक | Senses |
| समबुद्धयः | समबुद्धय | अ , पु , १ , एक | equanimous |
| ते | तत् | त् – सर्व , पु , १ , ब | They |
| माम् | अस्मद् | द् – सर्व , NA , २ , एक | me |
| सर्वभूतहिते | सर्वभूतहित | अ , पु , ७ , एक | In wellness of all beings |
| रताः | रत | अ , पु , १ , ब | Pleasures |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
सन्नियम्य = सन् + नियम् + य = Having controlled
(कृदन्त = उपसर्ग + धातु + ल्यबन्त)
अन्वयः
ये तु सन्नियम्य इन्द्रियग्रामम् सर्वत्र समबुद्धयः सर्वभूतहिते रताः , अक्षरम् अनिर्देश्यम् अव्यक्तम् सर्वत्रगम् अचिन्त्यम् कूटस्थम् अचलन् ध्रुवम् च पर्युपासते , ते माम् एव प्राप्नुवन्ति ।
Those who, having controlled all their senses, equanimous everywhere, rejoicers of welfare of all beings, worship the imperishable, undefinable, unmanifested, all pervading, unthinkable, unchangeable, steady and eternal, they also attain me.
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ १२-५॥
सन्धिः
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् = क्लेशः (अतो रोरप्लुतादप्लुते) + अधिकतरः (विसर्जनीयस्य सः) + तेषाम् + अव्यक्त-आसक्त-चेतसाम्
गतिर्दुःखं = गतिः (ससजुषो रुः) + दुःखं
देहवद्भिरवाप्यते = देहवद्भिः (ससजुषो रुः) + अवाप्यते
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| क्लेशः | क्लेश | अ , पु , १ , एक | trouble |
| अधिकतरः | अधिकतर | अ , पु , १ , एक | greater |
| तेषाम् | तत् | त् – सर्व , नपु , ६ , ब | Of those |
| अव्यक्त-आसक्त-चेतसाम् | अव्यक्त-आसक्त-चेतसाम् | Fixed minds on unmanifested | |
| अव्यक्ता | अव्यक्ता | आ , स्त्री , १ , एक | unmanifested |
| गतिः | गति | इ , स्त्री , १ , एक | goal |
| दुःखम् | दुःख | अ , पु , २ , एक | pain |
| देहवद्भिः | देहवत् | त् , नपु , ४ , ब | For the embodied |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| अव-आप्यते | आप् , ५ , आ , लट् , प्र , एक | (He) is reached |
अन्वयः
तेषाम् अव्यक्त आसक्त-चेतसाम् क्लेशः अधिकतरः देहवद्भिः , अव्यक्ता गतिः हि दुःखम् अवाप्यते ।
Of those embodied, whose minds are set on unmanifested, greater is the trouble. Unmanifested is indeed painful to reach.
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ १२-६॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ १२-७॥
सन्धिः
अनन्येनैव = अनन्येन (वृद्धिरेचि) + एव
ध्यायन्त उपासते = ध्यायन्तः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य) + उपासते
मय्यावेशितचेतसाम् = मयि (इको यणचि) + आवेशित-चेतसाम्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| ये | यद् | द् – सर्व , पु , १ , ब | Those who |
| सर्वाणि | सर्व | अ – सर्व , नपु , २ , ब | All |
| कर्माणि | कर्मन् | न् , नपु , २ , ब | Actions |
| मयि | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ७ , एक | In me |
| मत्पराः | मत्पर | अ , पु , १ , ब | Regarding me as supreme |
| अनन्येन | अनन्य | अ , पु , ३ , एक | With Single minded / without other |
| योगेन | योग | अ , पु , ३ , एक | By yoga |
| माम् | अस्मद् | द् – सर्व , NA , २ , एक | me |
| ध्यायन्तः | ध्यायन् | न् , पु , १ , ब | meditating |
| तेषाम् | तत् | त् – सर्व , पु , ६ , ब | Of those |
| माम् | अस्मद् | द् – सर्व , NA , १ , एक | I |
| समुद्धर्ता | समुद्धर्तॄ | ऋ , पु , १ , एक | saviour |
| मृत्युसंसारसागरात् | मृत्युसंसारसागर | अ , पु , ५ , एक | Beyond ocean of mortal world |
| नचिरात् | नचिरात् | अ , पु , ५ , एक | immediately |
| पार्थ | पार्थ | अ , पु , सं , एक | Paarth (Arjun) |
| आवेशित-चेतसाम् | आवेशित-चेतस् | स् , नपु , ६ , ब | Of fixed minds |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय :
संन्यस्य = सम् + नि + अस् + य = Having renounced
(कृदन्त – उपसर्ग + अस् + ल्यबन्त)
अन्वयः
ये तु मत्पराः मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य अनन्येन योगेन एव ध्यायन्तः माम् उपासते , (हे) पार्थ, अहम् मयि आवेशित-चेतसाम् , तेषाम् मृत्युसंसारसागरात् नचिरात् समुद्धर्ता भवामि ।
But those who, renouncing all actions in me, regarding me as supreme, meditating with single minded devotion, worship me; Hey Paartha, for those whose minds are set on me for long time, I am savior, out of ocean of samsaar.
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ १२-८॥
सन्धिः
मय्येव = मयि (इको यणचि) + एव
मन आधत्स्व = मनः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य) + आधत्स्व
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| मयि | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ७ , एक | In me |
| मनः | मनस् | स् , नपु , २ , एक | mind |
| बुद्धिम् | बुद्धि | इ , स्त्री , २ , एक | intellect |
| संशयः | संशय | अ , पु , १ , एक | doubt |
पदपरिचय – तिङ्न्त
अन्वयः
मयि एव मनः आधत्स्व , मयि बुद्धिम् निवेशय , मयि एव निवसिष्यसि , अत ऊर्ध्वम् संशयः न ।
Fixing your mind in me only, placing intellect in me, you shall live only in me. There is no doubt thereafter.
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥ १२-९॥
सन्धिः
ततो मामिच्छाप्तुं = ततः (हशि च, आद्गुणः) + माम् + इच्छा (अकः सवर्णे दीर्घः) + आप्तुम्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| चित्तम् | चित्त | अ , पु , २ , एक | Mind |
| मयि | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ७ , एक | In me |
| स्थिरम् | स्थिर | अ , पु , २ , एक | steadily |
| अभ्यासयोगेन | अभ्यासयोग | अ , पु , ३ , एक | By practicing yoga |
| माम् | अस्मद् | द् – सर्व , NA , २ , एक | me |
| इच्छा | इच्छा | आ , स्त्री , १ , एक | Wish |
| धनञ्जय | धनञ्जय | अ , पु , सं , एक | Dhananjaya (Arjun) |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| शक्नोषि | शक् , ५ , प , लट् , म , एक | (You) can |
पदपरिचय – अव्यय :
समाधातुम् = सम + आधा + तुम् = to properly fix
(कृदन्त = उपसर्ग + धातु + तुमुन्)
आप्तुम् = आप् + तुम् = to reach
(कृदन्त = धातु + तुमुन्)
अन्वयः
(हे) धनञ्जय , अथ (त्वाम्) मयि चित्तम् स्थिरम् समाधातुम् न शक्नोषि , ततः अभ्यासयोगेन माम् इच्छा आप्तुम् ।
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १२-१०॥
सन्धिः
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि = अभ्यासे (एङः पदान्तादति) + अपि (इको यणचि) + असमर्थः (अतो रोरप्लुतादप्लुते) + असि
मत्कर्मपरमो भव = मत्कर्मपरमः (हशि च, आद्गुणः) + भव
कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि = कुर्वन् + सिद्धिम् + अवाप्यसि
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| अभ्यासे | अभ्यासे | अ , पु , ७, एक | At practice |
| असमर्थः | असमर्थ | अ , पु , १ , एक | Incapable |
| मत्कर्मपरमः | मत्कर्मपरम | अ , पु , १ , एक | Superior actions for my sake |
| मदर्थम् | मदर्थ | अ , पु , २ , एक | For my sake |
| कर्माणि | कर्मन् | न् , नपु , २ , ब | actions |
| कुर्वन् | कुर्वत् | त् , पु , १ , एक | doing |
| सिद्धिम् | सिद्धि | इ , पु , २ , एक | perfection |
पदपरिचय – तिङ्न्त
अन्वयः
अभ्यासे अपि असमर्थः असि, मत्कर्मपरमः भव । मदर्थम् अपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिम् अवाप्यसि ।
If you incapable of practice also, perform actions for my sake. Even by doing actions for my sake, you shall attain perfection.
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ १२-११॥
सन्धिः
अथैतदप्यशक्तोऽसि = अथ (वृद्धिरेचि) + एतद् + अपि (इको यणचि) + अशक्तः (अतो रोरप्लुतादप्लुते) + असि
मद्योगमाश्रितः = मत् (झलां जशोऽन्ते) + योगम् + आश्रितः
यतात्मवान् = यत् + आत्मवान्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| एतद् | एतद् | त् – सर्व , नपु , १ , एक | This |
| अशक्तः | अशक्त | अ , पु , १ , एक | Unable |
| मत् | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ५ , एक | My |
| योगम् | योग | अ , पु , २ , एक | Yoga |
| आश्रितः | आश्रित | अ , पु , १ , एक | Refuge in |
| सर्वकर्मफलत्यागम् | सर्वकर्मफलत्याग | अ , पु , २ , एक | Renouncing fruits of all actions |
| यत् | यद् | द् – सर्व , नपु , १ , एक | Those |
| आत्मवान् | आत्मवत् | त् , पु , १ , एक | Self-controlled |
पदपरिचय – तिङ्न्त
पदपरिचय – अव्यय
कर्तुम् = कृ + तुम् = to do
(कृदन्त = धातु + तुमुन्)
अन्वयः
अथ एतद् अपि कर्तुम् अशक्तः असि , ततः मत् योगम् आश्रितः , यत् आत्मवान् सर्वकर्मफलत्यागम् कुरु ।
If you cannot do even this, then taking refuge me, self-controlled, renounce fruits of all action.
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ १२-१२॥
सन्धिः
श्रेयो हि = श्रेयः (हशि च, आद्गुणः) + हि
ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं = ज्ञानम् + अभ्यासात् (स्तोः श्चुना श्चुः, झलां जशोऽन्ते) + ज्ञानात् (झलां जशोऽन्ते) + ध्यानम्
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् = ध्यानात् + कर्मफ़लत्यागः (विसर्जनीयस्य सः) + त्यागात् (स्तोः श्चुना श्चुः) + (शश्छोऽटि) शान्तिम् + अनन्तरम्
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| श्रेयः | श्रेयस् | स् , नपु , २ , एक | Better |
| ज्ञानम् | ज्ञान | अ , नपु , १ , एक | Knowledge |
| अभ्यासात् | अभ्यास | अ , पु , ५ , एक | Than practice |
| ज्ञानात् | ज्ञान | अ , नपु , ५ , एक | Than knowledge |
| ध्यानम् | ध्यान | अ , नपु , १ , एक | meditation |
| ध्यानात् | ध्यान | अ , नपु , ५ , एक | Than meditation |
| कर्मफ़लत्यागः | कर्मफ़लत्याग | अ , पु , १ , एक | Renunciation of fruits of action |
| त्यागात् | त्याग | अ , पु , ५ , एक | From renunciation |
| शान्तिम् | शान्ति | इ , पु , २ , एक | peace |
| अनन्तरम् | अनन्तर | अ , नपु , १ , एक | thereafter |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| विशिष्यते | शास् , २ , आ , ल्रुट् , प्र , एक | (He) excels |
अन्वयः
अभ्यासात् ज्ञानम् श्रेयः हि । ज्ञानात् ध्यानम् विशिष्यते । ध्यानात् कर्मफ़लत्यागः (विशिष्यते) । त्यागात् शान्तिम् अनन्तरम् ।
Knowledge is indeed better than practice. Meditation is better than knowledge. Renunciation of fruits of action excels meditation. peace follows renunciation.
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १२-१३॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १२-१४॥
सन्धिः
करुण एव = करुणः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य) + एव
निर्ममो निरहङ्कारः = निर्ममः (हशि च, आद्गुणः) + निरहङ्कारः
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः = मयि (इको यणचि) + अर्पित + मनः (हशि च, आद्गुणः) + बुद्धिः (ससजुषो रुः) + यः (हशि च, आद्गुणः) + मद्भक्तः
स मे = सः (एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि) + मे
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| अद्वेष्टा | अद्वेष्टा | आ , स्त्री , १ , एक | Without hate |
| सर्वभूतानाम् | सर्वभूत | अ , पु , ६ , ब | to all beings |
| मैत्रः | मैत्र | अ , पु , १ , एक | friendly |
| करुणः | करुण | अ , पु , १ , एक | compassionate |
| निर्ममः | निर्मम | अ , पु , १ , एक | Without “my-ness” |
| निरहङ्कारः | निरहङ्कार | अ , पु , १ , एक | Without ego |
| समदुःखसुखः | समदुःखसुख | अ , पु , १ , एक | Balanced in pain and pleasure |
| क्षमी | क्षमी | ई , स्त्री , १ , एक | forgiving |
| सन्तुष्टः | सन्तुष्ट | अ , पु , १ , एक | content |
| सततम् | सततम् | अ , नपु , १ , एक | Ever steady |
| योगी | योगी | ई , स्त्री , १ , एक | Yogi |
| यतात्मा | यतात्मन् | न् , पु , १ , एक | Self-controlled |
| दृढनिश्चयः | दृढनिश्चय | अ , पु , १ , एक | Firm conviction |
| मयि | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ७ , एक | to me |
| अर्पित | अर्पित | surrender | |
| मनः | मनस् | स् , नपु , १ , एक | mind |
| बुद्धिः | बुद्धि | इ , स्त्री , १ , एक | intellect |
| यः | यद् | द् – सर्व , पु , १ , एक | One who |
| मद्भक्तः | मद्भक्त | अ , पु , १ , एक | My devotee |
| सः | तत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | He |
| मे | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , एक | Of me / to me |
| प्रियः | प्रिय | अ , पु , १ , एक | dear |
अन्वयः
यः मद्भक्तः सर्वभूतानाम् अद्वेष्टा, (सर्वभूतानाम्) मैत्रः , (सर्वभूतानाम्) करुण एव च, निर्ममः निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी सततम् सन्तुष्टः योगी यत् आत्मा दृढनिश्चयः मयि अर्पित मनः बुद्धिः , सः मे प्रियः (अस्ति) |
My devotee who has no hatred towards all beings, friendly and compassionate towards all, without my-ness, I-ness, balanced in pleasures and pains, forgiving, ever content in meditation, self-controlled, of firm conviction, with his mind and intellect dedicated in me, he is very dear to me.
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १२-१५॥
सन्धिः
यस्मान्नोद्विजते = यस्मात् (यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा) + न (आद्गुणः) + उद्विजते
लोको लोकान्नोद्विजते = लोकः (हशि च, आद्गुणः) + लोकात् (यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा) + न (आद्गुणः) + उद्विजते
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः= हर्ष (अकः सवर्णे दीर्घः) + आमर्ष + भय (आद्गुणः) + उद्वैगैः (ससजुषो रुः) + मुक्तः (हशि च, आद्गुणः) + यः
स च = सः (एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि) + च
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| यस्मात् | यद् | द् – सर्व , पु ,५ , एक | From whom |
| लोकः | लोक | अ , पु , १ , एक | The world |
| लोकात् | लोक | अ , पु , ५ , एक | From the world |
| यः | यद् | द् – सर्व , पु , १ , एक | One who |
| हर्ष-आमर्ष-भय-उद्वैगैः | हर्ष-आमर्ष-भय-उद्वैग | अ , पु , ३ , एक | By Joy, envy, fear and anxiety |
| मुक्तः | मुक्तः | अ , पु , १ , एक | free |
| सः | तत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | He |
| मे | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , एक | Of me / to me |
| प्रियः | प्रिय | अ , पु , १ , एक | dear |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| उत्-विजते | विज् , ६, आ , लट् , प्र , एक | (he) is agitated |
अन्वयः
यस्मात् लोकः न उद्विजते, लोकात् न उद्विजते च यः , हर्ष आमर्ष भय उद्वैगैः मुक्तः यः , सः मे प्रियः च (अस्ति) ।
By whom the world does not get agitated, one who does not get agitated by the world as well, one who is free from joy envy fear and anxiety, he is very dear to me.
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १२-१६॥
सन्धिः
शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः = शुचिः (ससजुषो रुः) + दक्षः (भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य) + उदासीनः (हशि च, आद्गुणः) + गतव्यथः
मद्भक्तः = मत् (झलां जशोऽन्ते) + भक्तः
स मे = सः (एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि) + मे
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| अनपेक्षः | अनपेक्ष | अ , पु , १ , एक | Free from expectations |
| शुचिः | शुचि | इ , स्त्री , १ , एक | pure |
| दक्षः | दक्ष | अ , पु , १ , एक | skilled |
| उदासीनः | उदासीन | अ , पु , १ , एक | unconcerned |
| गतव्यथः | गतव्यथ | अ , पु , १ , एक | untroubled |
| सर्वारम्भपरित्यागी | सर्वारम्भपरित्यागी | ई , स्त्री , १ , एक | Renouncing all commencements |
| यः | यद् | द् – सर्व , पु , १ , एक | One who |
| मद्भक्तः | मद्भक्त | अ , पु , १ , एक | My devotee |
| सः | तत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | He |
| मे | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , एक | Of me / to me |
| प्रियः | प्रिय | अ , पु , १ , एक | dear |
अन्वयः
यः मद्भक्तः अनपेक्षः शुचिः दक्ष उदासीनः गतव्यथः सर्वारम्भपरित्यागी , सः मे प्रियः (अस्ति)।
My devotee, the who one has no expectations, is pure, alert, unconcerned about the future, untroubled by the past, who has given up doership, he is dear to me.
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १२-१७॥
सन्धिः
यो न = यः (हशि च, आद्गुणः) + न
स मे = सः (एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि) + मे
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| शुभाशुभपरित्यागी | शुभाशुभपरित्यागी | ई , स्त्री , १ , एक | Renoucing good and evil |
| भक्तिमान् | भक्तिमत् | त् , पु , १ , एक | Full of devotion |
| यः | यद् | द् – सर्व , पु , १ , एक | One who |
| सः | तत् | त् – सर्व , पु , १ , एक | He |
| मे | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , एक | Of me / to me |
| प्रियः | प्रिय | अ , पु , १ , एक | dear |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
|---|---|---|
| हृष्यति | हृष् , ४ , प , लट् , प्र , एक | (He) rejoices |
| द्वेष्टि | द्विष् , २ , प ,लट् , प्र , एक | (He) hates |
| शोचति | शुच् , १ , प , लट् , प्र , एक | (He) grieves |
| काङ्क्षति | काङ्क्ष् , १ , प , लट् , प्र , एक | (He) desires |
अन्वयः
यः न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति शुभ-अशुभ-परित्यागी भक्तिमान् , यः सः मे प्रियः (अस्ति) ।
He who neither (excessively) rejoices, nor hates, nor grieves, nor desires, renouncing all good and evil, full of devotion, he is dear to me.
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १२-१८॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १२-१९॥
सन्धिः
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी = तुल्य-निन्दा-स्तुतिः (ससजुषो रुः) + मौनी
सन्तुष्टो येन = सन्तुष्टः (हशि च, आद्गुणः) + येन
स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे = स्थिर-मतिः (ससजुषो रुः) + भक्तिमान् + मे
प्रियो नरः = प्रियः (हशि च, आद्गुणः) + नरः
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
|---|---|---|---|
| समः | सम | अ , पु , १ , एक | One who is same |
| शत्रौ | शत्रु | उ , पु , ७ , एक | To enemies |
| मित्रे | मित्र | अ , पु , ७ , एक | To friend |
| मान-अपमानयोः | मान-अपमान | अ , पु , ६ , द्वि | In honor of dishonor |
| शीतोष्णसुखदुःखेषु | शीत-उष्ण-सुख-दुःख | अ , पु , ७ , ब | In Cold-heat-pleasure-pain |
| सङ्गविवर्जितः | सङ्ग-विवर्जित | अ , पु , १ , एक | Free from attachment |
| तुल्य-निन्दा-स्तुतिः | तुल्य-निन्दा-स्तुति | इ , पु , १ , एक | Regardless of praise or criticism |
| मौनी | मौनी | ई , स्त्री , १ , एक | silent |
| सन्तुष्टः | सन्तुष्ट | अ , पु , १ , एक | content |
| अनिकेतः | अनिकेत | अ , पु , १ , एक | homeless |
| स्थिर-मतिः | स्थिर-मति | इ , पु , १ , एक | Steady minded |
| भक्तिमान् | भक्तिमत् | त् , पु , १ , एक | Full of devotion |
| मे | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , एक | Of me / to me |
| प्रियः | प्रिय | अ , पु , १ , एक | dear |
| नरः | नर | अ , पु , १ , एक | man |
अन्वयः
(यः) समः शत्रौ च मित्रे च , तथा समः मान-अपमानयोः शीतोष्णसुखदुःखेषु , सङ्गविवर्जितः , तुल्य-निन्दा-स्तुतिः मौनी , येन केनचित् सन्तुष्टः , अनिकेतः , स्थिरमतिः , (सः) भक्तिमान् नरः मे प्रियः (अस्ति) ॥
The one who is same to friends and enemies, in honor and dishonor, in cold and heat, in pleasures and pain, free from attachment, regardless of praise or criticism, silent, content in any which way, homeless, steady minded, full of devotion, that man is dear to me.
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ १२-२०॥
सन्धिः
धर्म्यामृतमिदं = धर्म्यामृतम् + इदम्
यथोक्तं = यथा (आद्गुणः) + उक्तम्
मत्परमा भक्तास्तेऽतीव = मत्परमाः (हलि सर्वेषाम्) + भक्ताः (विसर्जनीयस्य सः) + ते (एङः पदान्तादति) + अतीव
पदपरिचय – सुबन्त
| पद | प्रातिपादीक | अन्त, लिंग, विभक्ति, वचन | Translation |
| ये | यद् | द् – सर्व , पु , १ , ब | Those who |
| धर्म्यामृतम् | धर्म्यामृत | अ , नपु , २ , एक | Nectar of dharma |
| इदम् | इदम् | म् – सर्व , नपु , २ , एक | This |
| उक्तम् | उक्त | अ , नपु , १ , एक | Said / described |
| श्रद्दधाना | श्रद्दधान् | न् , नपु , ३ , एक | Endowed with faith |
| मत्परमाः | मत्परम | अ , पु , १ , ब | (consider) Me as supreme |
| भक्ताः | भक्त | अ , पु , १ , ब | Devotees |
| ते | तत् | त् – सर्व , पु , १ , ब | Those |
| मे | अस्मद् | द् – सर्व , NA , ६ , एक | Of me / to me |
| प्रियाः | प्रिय | अ , पु , १ , ब | dear |
पदपरिचय – तिङ्न्त
| पद | धातु , गण , पद , लकार , पुरुष , वचन | Translation |
| परि-उप-आसते | आस् , २ , प , लट् , प्र , ब | (They) follow |
अन्वयः
ये तु धर्म्यामृतम् इदम् यथा उक्तम् पर्युपासते , ते श्रद्दधाना मत्परमाः भक्ताः मे अतीव प्रियाः (भव) ।
Those who indeed follow this immortal dharma, as described, endowed with faith, regarding me as supreme, those devotees, are very dear to me.